बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

दैनन्दिनी

मातृश्वरी बोधमयं च सत्यं
साहित्यसंगीत कलादि रूपं |
संज्ञान - ज्ञानश्च विज्ञान दातृ
वागीश्वरी त्वां चरणं नमामी ||


कंबु-कुंदेन्दु-मुक्ता तुषार शुक्लां
        या वर्णार्थ रस छंद साहित्य मूर्ति |
सद्विचारसार  जाड्यान्धकारापहम्
         बुद्धिप्रदां माँ सरस्वती भगवती ||


सत्यंज्ञानमतिः च काव्य-रस-कला साहित्य-संगीत रूपं
या वर्णार्थ सुवेदविधि गणितशास्त्रं ज्ञानविज्ञानकारं |
स्तोत्रे नवरत्नवर्णरचितं मस्यांकितम् पत्रकम्
सङ्कल्पेन समर्पितं तव पदे माता नमामित्व्वाम् ||

शान्तं शाश्वतसत्यज्ञान सहजं वैराग्य विज्ञान च
विद्यांसिद्धि भवेत सर्वसुलभे शांतिस्वरूपा कृपा |
मिथ्याज्ञानविनाश मा कुरू नमामि त्वां पदे भारती
विद्यांंदेहि नमस्तुते भगवती भक्तेष्टसिद्धिप्रदाम् ||

  विद्याकर गणेश्वर भव-भवानी नंदनं
       मुद मंगलदाता जय विघ्नेश्वराय |
   प्रवल-पावक-महाज्ज्वालमाला-वमन
          नमो नित्यं    सहस्रकिरणोज्ज्वलाय ||

    हरि-हर-अज वंदित चरन,  जय  भवपालक राम |
      विज्ञाविज्ञ जनों को ‘रवि’ सविनय करत प्रणाम ||

दैनंदिनी अति शुभ्र सुहावनी | पावन अमल विमल मनभावनी ||
धवल दुग्ध सम वादन मनोहर | वर्णरत्न अंकित ता उपार ||
शब्दाभूषन भूषित सुन्दर | पत्र-पत्र अंकित विचार वर ||
भाषा भनिति काव्य रस सरिता | नितनव मन मुदमंगल भरिता ||
सखा सत्य दैनिकी हमारी | बिधुबदनी सब भांति सँवारी ||
सदा एक रस मति अति धीरा | सत्य दैनिकी कागद कोरा ||
प्रीति प्रतीति भयउ मन मोरे | कागद मसी मित्र मानव के ||

दैनंदिनी मेरी सुहावनी है मनभावनी पावनी बानी सुहाए |
शब्दही भूषन भूषित सुन्दर मोदक प्रीति की रीति बनाए ||
प्रिय पावन मित्र-विचित्र यहै जो लिखै निज लेखनि बानी बनाये |
जो उभरै हिय अंतर मेरो सो सब कागद लेख लिखाए ||



 अति आनंद तरंग मन, प्रीति विपुल बहुरंग |
 छः बर्ष बीते मधुर, सखा तुम्हारे संग ||


दैनंदिनी से लाभ अपारा | बरनउ कुछ मति अनुसारा ||
प्रथमहिं सत्य सखा यह होइ | मित्र-विचित्र न ऐसा कोई ||
मसि कागद से करहि मिताई | पावहि नर सब विधि प्रभुताई ||
जगभर के सब कहहि विचारक | दैनंदिनी व्यक्तित्व सुधारक||
सद्गुरु सम यह देहि विचारा | प्रेरित करहि जीवन कै धारा ||
नित नव होहि ज्ञान-विज्ञाना | काव्य कला रचना रस नाना ||
अस विचार मैं कर मन माही | प्रतिदिन निज दैनंदिनी लिखही ||
गद्य काव्य वर भेद अनेका | लिखिहउ सकल विषय स्वविवेका ||
कथा निबंध पत्र विधि  नाना | छंद प्रबंध अनेक विधाना ||
गणितशास्त्र भौतिकी रसायन | जीवविज्ञान ज्ञान वर जीवन ||
जोतिष ऋतुविज्ञान खगोला | खनिज धारा रचना भुगोला ||
सिद्धान्त विधि सूक्ति वर बचना | विज्ञ कथन   कोविद रचना ||
लिखन प्रयास करबि मैं सोई | मेरे मन प्रबोध जस होई ||
जो विचार प्रेरित मम हिय से | सो लिखिहउ कागद पर मसि से ||
छमिहहिं विज्ञ दोष सब मोरे | मै मतिमंद बुद्धि अति भोरे ||
साहित्य विवेक एक नहीं मोरे | सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे ||
कर गहि पंकज पद रघुवर की | मागऊँ वर मै स्वान्तः सुख की ||
मार्गप्रदर्शक जीवन पथ की | दैन्दिनी यह 'रवि शंकर' की ||

       मंगल करनी सुपथ प्रदर्शीनी मल हरनि दैनन्दिनी |
गति सरस सरित सहित्य की होइहिं रवि की मनभावनी ||
      'रवि ' विनय करहि सहर्ष जय-जय माँ भगवती भारती |  
      माँ देहऊ अविरल भक्ति बुद्धि हरहु 'रवि ' की आरती ||

रविशंकर मिश्र


( यह दैनंदिनी मैं साप्ताहिक लिखने का प्रयास करुगा | पूर्वांकित भूमिका मैंने प्रथम वर्ष में लिखी थी; परंतु भूमिका का यह कलेवर कुछ  बाद सन २०१५ में लिखा गया | मंगलाचरण के एक एक  श्लोक लगभग प्रतिवर्ष  रचे जाते रहे | श्लोक २&५  पहले वर्ष; ३,४,&१ क्रमसः अगले वर्षों में लिखे गए | )