माघ शुक्ल पञ्चमी (वसन्त पञ्चमी).
प्रिय दैनन्दिनी !
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं
Happy Birthday दैनिके !
आज तुम्हारा जन्मदिन है।
…और कितनी विचित्र बात है न; जो मेरे हृदय की भावभूमि में शब्द-दर-शब्द सहचरी रही। … कितना निष्ठुर और धृष्ट हूँ न मै; …पूरे चार वर्ष तक न एक शब्द, न कोई चिट्ठी पत्री। तुमसे मिलने का थोड़ा भी समय नहीं निकल पाया, तुम्हारा यह धृष्ट प्रेमी। …आज अचानक शब्द पुष्प लिए द्वार पर खड़ा है। मानो कुछ हुआ ही न हो।
जानता हूँ, तुम वर्षों से प्रतीक्षा में बैठी हो। तुम्हारा यूं भौहें चढ़ा बैठना उचित ही है! “अब याद आई? तुम्हारी व्यस्तताओं के बहाने बहुत बार सुनी हूँ मैं।” जानता हूँ, दोष मेरा ही है। प्रिय दैनिके! … हाय!... अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में, आज भी उतनी ही सादगी और धैर्य। …आज इतने वर्षों बाद तुम्हें पुनः स्मरण कर मन में लज्जा भी है और गहरी आत्मीयता भी। यदि संभव हो, तो मेरी इस लंबी अनुपस्थिति को एक थके हुए प्रेमी की विवशता समझ कर क्षमा कर देना। पर क्या करूँ प्रिये! …इधर बीच जीवनवृत्ति के लिए बहुत कुछ लिखा-पढ़ा। परंतु तुम्हें एक चिट्ठी तक लिखने का समय और साहस नहीं हुआ मुझे! मै तुम्हारे धवल तन पर अपना मन न्यौछावर नहीं कर पाया। …तुम्हारे धवल उरोजों पर विविध भांति की चित्रकारी करने वाली, मेरी अंगुलियों में नृत्य करती पाञ्चाली, वर्षों तक निश्चेष्ट पड़ी रही। प्रिये! इतने दिनों तक मै तुम्हें स्पर्श भी न कर सका। पर विश्वास मानो, मेरे हर अधूरी साँस में तुम्हारी स्याही की गंध बसी रही।
तुम्हें याद है दैनिके! वर्षों पहले आज ही के दिन तुम्हारे पहले पन्ने पर मैंने काँपते हाथों से अपना मन उकेरा था। तुमने बिना टोके सब सुना। मेरी उलझनें, मेरी प्रसन्नताएँ, मेरी हार, मेरी छोटी-मोटी जीतें। तुम कभी प्रश्न नहीं बनीं, कभी शिकायत नहीं की। बस सहेजती रहीं मुझे, मेरे ही शब्दों में। आज यह सब लिखते हुआ नेत्र सजल हो रहे हैं। कभी ये आँसू ही पहली स्याही बनकर उमड़े थे मेरे हृदय से। और आज वह सब पुरानी यादें सोचकर मैं अपने ही हृदय की भावनाओं में बहता जा रहा हूँ। प्रिये! मुझे संभालो ना! …प्रिये! मैं तुम्हारे भीतर अपने मन को उतार कर हल्का हो जाया करता था। और तुम… तुम बड़ी चुपचाप सब सुन और सह लेती थी। न कोई उलाहना, न प्रश्न, बस सब अपने भीतर सहेज लेती थी। …दैनंदिनी! तुम मान जाओ।… आज से हम फिर बातें करेंगे। बिना औपचारिकता के, बिना डर के, बस जैसे पहले करते थे। आज तुम्हारे जन्मदिन पर मैं वचन देता हूँ। अब तुम्हें ऐसे अकेला नहीं छोड़ूँगा। कभी दो पंक्तियाँ सही, कभी अधूरा वाक्य ही सही, पर हर बार तुमसे मिलने ज़रूर आऊँगा।
तुम्हारा
वही पुराना प्रेमी
जो तुम्हारे बिना अधूरा है। और जो तुम्हारे बिना
एक पंक्ति भी पूरा नहीं कर पाता था। 📖❤️
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